पलारी विकासखंड के ग्रामीण क्षेत्रों में ऊर्जा उपभोग एवं आवासीय दशाएं:
एक भौगोलिक अध्ययन
डॉ घनश्याम नागे
अतिथि व्याख्याता, भूगोल, पंडित जवाहरलाल नेहरू शासकीय कला एवं विज्ञान स्नातकोत्तर महाविद्यालय, बेमेतरा, छत्तीसगढ़.
*Corresponding Author E-mail:
ABSTRACT:
अध्ययन क्षेत्र क्षेत्र में आवास की दशा एवं ऊर्जा उपभोग के वितरण प्रतिरूप में विभिन्न कृषक परिवारों में बहुत अधिक विभिन्नता मिलती है। अध्ययन क्षेत्र में घरेलू ईंधन के रूप में ऊर्जा के परंपरागत स्रोतों में लकड़ी और कंडे का अधिक उपयोग किया जा रहा है। जिससे पर्यावरणीय प्रदूषण की समस्याएं उत्पन्न हो रही है। लकड़ी का ईंधन के रूप में अधिकाधिक उपयोग होने के कारण गाँव में पहले से बिगड़ रही वनस्पति की स्थिति पर दबाव और बढ़ता जा रहा है। गाँव में पेड़ पौधों के अधिक कटाई पर शासकीय कड़े नियंत्रण की अधिक आवश्यकता है। ऊर्जा की परंपरागत साधनों का सीमित उपयोग एवं वैकल्पिक साधनों के उपयोग किए जाने की आवश्यकता है। इसके साथ ही ग्रामीण क्षेत्र के लोगों के परंपरागत मानसिकता की सोच में बदलाव की जरूरत है। शासन द्वारा भूमिहीन एवं लघुकृषक परिवारों के साथ ही साथ अन्य कृषक परिवारों को भी शासन की योजनाओं का लाभ मिले ऐसा नीति बनाए जाने की आवश्यकता है। जिससे उनकी आवासीय दशा एवं स्वास्थ्य स्तर को बेहतर बनाया जा सके। इससे ग्रामीण क्षेत्र का विकास संभव है।
KEYWORDS: ऊर्जा उपभोग, किलोकैलोरी, आवासीय दशा, कृषिजोत आकार, उपलब्धता।
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ग्रामीण क्षेत्रों में ऊर्जा की मांग दिनों-दिन बढ़ती जा रही है । वर्तमान समय में ऊर्जा का उपयोग मुख्य रूप से खाना बनाने, प्रकाश की व्यवस्था करने और कृषि कार्य में किया जा रहा है। 75 प्रतिशत ऊर्जा की खपत खाना बनाने और प्रकाश प्राप्त करने हेतु उपयोग में लाया जा रहा है।
ऊर्जा प्राप्त करने के लिए बिजली के अतिरिक्त स्थानीय स्तर पर उपलब्ध जैव ईंधन एवं केरोसीन आदि का उपयोग भी ग्रामीण परिवारों द्वारा बड़े पैमाने पर किया जाता है ।
ऊर्जा के स्रोत के रूप में लकड़ी, कोयला, रसोइ्र्र गैस व बिजली के महत्व व उपयोग को देखा जा रहा है। ग्रामीण क्षेत्रों में विशेषकर कंडा व लकड़ी का इस्तेमाल धड़ल्ले से किया जा रहा है, जिससे वन विनाश व पर्यावरण गतिविधियों में तेजी से बदलाव होने लगा है, अतः आवश्यकता इस बात की है, कि मनुष्य द्वारा उपभोग किए जा रहे विभिन्न प्रकार के ईंधन की सीमितता को ध्यान में रखकर उपयोग किया जाए। ऊर्जा के विभिन्न साधनों का उपयोग आवासीय दशाओं पर निर्भर करता है। सांस्कृतिक भू दृश्यों में अधिवास सर्वप्रमुख तथ्य है। अधिवास अपने आकार - प्रकार के अनुसार विभिन्न प्रकार के होते हैं। कुछ परिवारों या गृह वाले लघु पुरवा से लेकर ग्राम, ग्रामीण बाजार, कस्बा, शहर एवं महानगर आदि सभी अधिवास के अंतर्गत सम्मिलित किए जाते हैं। इन बस्तियों में निवास करने वाली जनसंख्या की आर्थिक सामाजिक एवं सांस्कृतिक संरचना में पर्याप्त विभिन्नता पाई जा सकती है। व्यवसाययो की प्रधानता तथा प्रकृति के अनुसार अधिवासो को मुख्यतः दो वर्गों में ग्रामीण और नगरीय अधिवास में वर्गीकृत किया जाता है। प्रस्तुत अध्ययन ग्रामीण अधिवासो की संरचना एवं उनकी दशाओं पर आधारित है। आवासीय दशा आर्थिक स्थिति व जीवन स्तर पर निर्भर करती है। आवास की दशाएं मानवीय जीवन को व्यापक रूप से प्रभावित करती है।, अतः आवास की संरचना में घर का प्रकार, दीवाल का प्रकार, छत का प्रकार ,कमरों की संख्या, पेयजल की सुविधा, शौचालय की व्यवस्था एवं प्रकाश की सुविधाएं तथा उसमें निवास करने वाले लोगों की संख्या आदि प्रभावित करता हैं, अतः अध्ययन क्षेत्र में ऊर्जा की आवश्यकता एवं उपयोग की मात्रा तथा आवासीय दशाओं की स्थिति का अध्ययन आवश्यक है।
अध्ययन का उद्देश्यः
1. अध्ययन क्षेत्र में प्रतिव्यक्ति प्रतिदिन ऊर्जा उपभोग प्रतिरूप का पता लगाना ।
2. विभिन्न कृषक परिवारों में ऊर्जा उपभोग के वितरण प्रतिरूप को ज्ञात करना ।
3. आवासीय दशाओं का अध्ययन करना ।
4. सुझाव एवं नियोजन प्रस्तुत करना ।
विधितंत्रः
प्रस्तुत शोध अध्ययन प्राथमिक आँकड़ों पर आधारित है। आँकड़ों का संकलन साक्षात्कार अनुसूची के माध्यम से किया गया है। इस अध्ययन के लिए अध्ययन क्षेत्र के 4 गाँवों का चयन उद्देश्य पूर्ण प्रतिचयन विधि द्वारा तथा परिवारों का चयन दैव निदर्शन विधि द्वारा किया गया है। परिवारों को उनके भू स्वामित्व के आधार पर चार वर्गों में वर्गीकृत कर अध्ययन किया गया है - भूमिहीन 0 एकड़ लघुकृषक 0 से 5 एकड़, मध्यम 5 से 10 एकड़, वृहत 10एकड़ से अधिक ।
अध्ययन क्षेत्रः
प्रस्तुत शोध अध्ययन का क्षेत्र पलारी विकासखंड है। यह क्षेत्र बलौदा बाजार जिले के अंतर्गत आता है। यह 21 32’ 35“ उत्तर से 21 32’ 37“ उत्तरी अक्षांश तथा 82 10’ 36“ पूर्व से 82°10’ 39’’पूर्वी देशांतर तक विस्तृत है। इसका कुल भौगोलिक क्षेत्रफल 594.64 वर्ग किलोमीटर है। यहां गाँवों की कुल संख्या 133, ग्राम पंचायत 101, जनपद पंचायत की संख्या 1 है। राजस्व निरीक्षक सर्किल की कुल संख्या 6 है। सन 2011 की जनगणना के अनुसार यहाँ की कुल जनसंख्या 2,02,179 है। यहाँ पुरुष जनसंख्या 1,00,825 व महिला जनसंख्या 1,01,354 है। यहाँ अनुसूचित जाति जनसंख्या 62,243 व जनजाति जनसंख्या 14,905 है। यहाँ जनसंख्या घनत्व 340 व्यक्ति प्रतिवर्ग किलोमीटर है ।
स्रोत:-व्यक्तिगत सर्वेक्षण 2002
अध्ययन क्षेत्र में ऊर्जा उपभोग (लकड़ी एवं कंडा) प्रतिरूपः
अध्ययन क्षेत्र में ऊर्जा के प्रमुख स्रोतों में लकड़ी एवं कंडा का उपयोग अधिक होता है। इन दो स्रोतों के अतिरिक्त ऊर्जा के अन्य स्रोतों में मिट्टी तेल, कोयला, रसोई गैस एवं बिजली आदि ऊर्जा के प्रमुख स्रोत है। अध्ययन क्षेत्र में ईंधन के रूप में लकड़ी का औसत उपभोग प्रतिव्यक्ति प्रतिदिन 2380 किलो कैलोरी है। भूमिहीन परिवारों में 2285 लघुकृषक परिवारों में 2269 मध्यम कृषक परिवारों में 2301 व वृहत परिवारों में 2640 किलो कैलोरी प्रतिव्यक्ति प्रतिदिन उपभोग होता है।
कंडा का उपभोग प्रतिरूप
सर्वेक्षित गाँव में कंडे का उपयोग तब होता है, जब लकड़ी की उपलब्धता में कमी होती है। यह लकड़ी के साथ ईंधन के रूप में साहचर्य का काम करता है। क्षेत्र में कंडे का औसत उपभोग प्रतिव्यक्ति प्रतिदिन 1172 किलोकैलोरी होता है। विभिन्न कृषक परिवारों में इसके उपभोग की मात्रा में बहुत भिन्नता मिलती है।
कंडे का सर्वाधिक उपभोग मध्यम कृषक परिवारों में होता है। मध्यम कृषक परिवारों में 1230 किलोकैलोरी प्रतिव्यक्ति प्रतिदिन होता है। भूमिहीन परिवारों में सबसे कम उपभोग 1104 किलोकैलोरी प्रतिव्यक्ति प्रतिदिन है। इसका कारण इसके यहाँ पालतू पशुओं जैसे गाय, बैल, भैंस एवं बकरी आदि पशुओं की कमी का होना मुख्य है। गोबर की कमी के कारण से पर्याप्त मात्रा में कंडा नहीं बनाया जाता है। भूमिहीन परिवार के लोग वृहत कृषक परिवारों के यहाँ खेतों से लकड़ी काटकर ईंधन के रूप में ऊर्जा का इस्तेमाल करते हैं।
मिट्टी तेल का औसत उपभोग प्रतिरूपः
अध्ययन क्षेत्र में ईंधन व प्रकाश प्राप्ति हेतु मिट्टी तेल का उपयोग मुख्यतः सभी आवासों में किया जाता है। अध्ययन क्षेत्र में इसका उपभोग 194 किलो कैलोरी प्रतिव्यक्ति प्रतिदिन है। भूमिहीन व लघुकृषक परिवारों में इसका उपभोग क्रमशः 233 व 208 किलोकैलोरी है। मध्यम व वृहत कृषक परिवारों में क्रमशः 164 व 173 किलोकैलोरी प्रतिव्यक्ति प्रतिदिन होता है। क्षेत्र में ईंधन के रूप में इसका उपयोग दाब वाले अथवा बत्ती वाले स्टोव में ऊर्जा प्राप्त करने तथा रात्रि में ग्रामीण क्षेत्रों में विद्युत आपूर्ति कुछ समय तक बाधित होने पर मिट्टी तेल का उपयोग प्रकाश प्राप्त करने हेतु किया जाता है।
विद्युत का उपभोग प्रतिरूपः
अध्ययन क्षेत्र के गाँवों के अधिकांश परिवारों में बिजली की व्यवस्था है ,परंतु अभी भी कुछ परिवार ऐसे हैं जहां बिजली की व्यवस्था नहीं है। अध्ययन क्षेत्र में बिजली का औसत उपभोग 259 किलो कैलोरी प्रतिव्यक्ति प्रतिदिन है। बिजली का सबसे अधिक औसत उपभोग वृहत एवं मध्यम परिवारों में होता है। यहां वृहत एवं मध्यम परिवारों में औसत उपभोग क्रमशः 533 एवं 270 किलोकैलोरी प्रतिव्यक्ति प्रतिदिन है। सबसे कम उपभोग भूमिहीन परिवारों में होता हैं। यहां 84 किलोकैलोरी प्रतिव्यक्ति प्रतिदिन है। सर्वेक्षित गाँव के विभिन्न कृषक परिवारों में बिजली के औसत उपभोग में बहुत विविधता पाई जाती है। गिर्रा गाँव में बिजली का औसत उपभोग 394 किलोकैलोरी प्रतिव्यक्ति प्रतिदिन है। यह अन्य सभी सर्वेक्षित गाँव की तुलना में सबसे अधिक है।
रसोई व गोबर गैस का उपभोग प्रतिरूपः
अध्ययन क्षेत्र के कुछ गिने-चुने वृहत परिवारों में रसोई व गोबर गैस का उपभोग ईंधन के रूप में होता है। क्षेत्र में रसोई गैस का औसत उपभोग 6 किलो कैलोरी प्रतिव्यक्ति प्रतिदिन है। रसोई गैस का औसत उपभोग केवल वृहत परिवारों में होता है। यहाँ 23 किलोकैलोरी प्रतिव्यक्ति प्रतिदिन होता है । गोबर गैस का औसत उपभोग 33 किलोकैलोरी प्रतिव्यक्ति प्रतिदिन है।
लघुकृषक परिवारों में 13 किलो कैलोरी व वृहत परिवारों में 131 किलोकैलोरी प्रतिव्यक्ति प्रतिदिन है। रसोई व गोबर गैस का औसत उपभोग अध्ययन क्षेत्र के केवल गिर्रा गांव में होता है, यहाँ इनका औसत उपभोग क्रमशः 90.68 व 526 किलोकैलोरी प्रतिव्यक्ति प्रतिदिन है ।
आवासीय दशाः
आवासीय दशा के माप में आवास का प्रकार महत्वपूर्ण स्थान रखता है। आवास का आकार -प्रकार मानव के निवास योग्यता को प्रदर्शित करता है। क्षेत्र के चयनित परिवारों के आवास को दो मुख्य भागों में विभाजित किया गया है। कच्चा व पक्का आवास। अध्ययन क्षेत्र के भूमिहीन परिवार के सभी 100 प्रतिशत मकान कच्चे हैं व पूर्णता मिट्टी से निर्मित है। अध्ययन क्षेत्र के सभी (308) सर्वेक्षित परिवारों में से 88.96 प्रतिशत परिवारों के मकान कच्चे तथा 11.04 प्रतिशत परिवारों के मकान पक्के हैं। लघुकृषक परिवारों के 90.91 प्रतिषत आवास कच्चे व 9.09 प्रतिशत परिवारों के मकान पक्के हैं। मध्यम कृषक परिवारों के 80.52 प्रतिशत मकान कच्चे व 11.48 प्रतिशत मकान पक्के हैं। वृहत कृषक परिवारों के 52.94 प्रतिशत मकान कच्चा व 45.06 प्रतिशत मकान पक्के हैं।
दीवाल का प्रकारः
आवास में दीवाल एक सुरक्षात्मक साधन है। यह पर्यावरण प्रभाव से रक्षा करती है ।एक श्रेष्ठ आवास की मजबूती उसके निर्माण सामग्री पर निर्भर करता है। पक्का दीवाल ईट व सीमेंट का बना होता है तथा अर्धपक्का दीवाल अधपके ईट व मिट्टी का बना होता है। अध्ययन क्षेत्र के आवास में सभी प्रकार के दीवाल पाए गए हैं। अध्ययन क्षेत्र के 85.38 प्रतिशत परिवारों के मकानों का दीवाल कच्चा व 9.74 प्रतिशत परिवारों के दीवाल पक्के एवं 4.88 प्रतिशत परिवारों के मकान कच्चा पक्का व मिश्रित है। क्षेत्र के भूमिहीन परिवारों के घरो का दीवाल 100 प्रतिशत पूर्ण रूप से कच्चे हैं। लघु परिवारों के घरो का दीवाल 88.82 प्रतिशत कच्चे व 9.09 प्रतिशत पक्के व 2.09 प्रतिशत दीवाल मिश्रित प्रकार के पाए गए हैं।
छत का प्रकारः
आवास का छत किसी परिवार की आर्थिक स्थिति को प्रदर्शित करने वाला प्रमुख तत्व हैं ।अध्ययन क्षेत्र के आवास में छत को तीन प्रकारों में रखा गया हैं। समान्यतः पक्का आवास का छत लोहा ,सीमेंट, रेत व पत्थरों के टुकड़ों से मिलकर बना होता है ,दूसरा मिट्टी से निर्मित खपरैल का व तीसरा घास-फूस से निर्मित होता है। अध्ययन क्षेत्र में वृहत परिवारों के घरो का छत सामान्यता पक्के होते है तथा अन्य कृषक परिवारों के मकानो का छत लकड़ी, बांस, खपरैल व घास- फूस से निर्मित होता है। छत पर्यावरण संबंधी प्रतिकूल प्रभाव से मनुष्य की रक्षा करता है। क्षेत्र के 6.81 प्रतिशत परिवारों के मकानों का छत कच्चे हैं। 90.91 प्रतिशत परिवारों के मकानों का छत खपरैल, बांस व लकड़ी आदि से निर्मित है तथा 2.28 प्रतिशत परिवारों के मकानों का छत घास-फूस आदि से निर्मित हैं।
लघुकृषक परिवारों के 97.20 प्रतिशत मध्यम कृषक के 95.08 प्रतिशत भूमिहीन परिवारों के 91.42 प्रतिशत मकानों के छत लकड़ी बांस व खपरैल आदि से निर्मित है। इसके अतिरिक्त क्षेत्र में 8.58 प्रतिशत भूमिहीन मजदूरों के व 0.71 प्रतिशत लघुकृषक परिवारों के मकानों का छत साधारण प्रकार के लकड़ी व घास -फूस से निर्मित है।
फर्श ( भू-सतह) का प्रकारः
आवास के आधारभूत ढांचगत तत्वों में भू-सतह का महत्वपूर्ण स्थान है। भू-सतह भी परिवार की स्थिति या जीवन स्तर का परिचायक होता है। अध्ययन क्षेत्र में भूमिहीन परिवारों के आवासों के भूसतह 100 प्रतिशत मिट्टी से निर्मित है। क्षेत्र के 87.07 प्रतिशत आवासों के भूसतह मिट्टी से तथा 8.77 प्रतिशत आवासों के भूसतह सीमेंट, रेत आदि से तथा 4.22 प्रतिशत भूसतह कांक्रीट से बने हुए हैं। अध्ययन क्षेत्र में लघु कृषक के 90.20 प्रतिशत परिवारों के आवासों मे भूसतह मिट्टी से एवं 9.80 प्रतिशत भूसतह सीमेंट, रेत आदि से निर्मित है। मध्यम कृषकों के 88.52 प्रतिशत परिवारों के मकानों का भू सतह मिट्टी का व 11.48 प्रतिशत आवासों में भूसतह सीमेंट व रेत आदि से निर्मित है। वृहत कृषकों के 44. 12 प्रतिशत आवासों के भू सतह मिट्टी से व 17.65 प्रतिशत भू-सतह सीमेंट, रेत आदि से तथा 38.23 प्रतिशत भू-सतह कंक्रीट व पत्थर से निर्मित है।
आवासीय क्षेत्रफलः
एक आदर्श आवास के लिए पर्याप्त क्षेत्रफल का होना आवश्यक है, जिसमें मनुष्य के निवास के लिए पर्याप्त स्थान होने के साथ-साथ उस क्षेत्र के पर्यावरण को अनुकूल बनाने के लिए पेड़ पौधे आदि लगाने के लिए पर्याप्त स्थान होनी चाहिए तभी आवास में पर्यावरण की दशाएं निवास योग्य हो सकती है। अध्ययन क्षेत्र के विभिन्न कृषक परिवारों के आवासों के क्षेत्रफल में बहुत भिन्नता मिलती है।
पार्क के अनुसार 212.5 वर्गफीट में दो व्यक्ति रह सकते हैं तथा 425 वर्गफीट स्थान पर चार व्यक्ति तथा 637.7 वर्गफीट में 7 व्यक्ति एवं 850 वर्गफीट में 8.5 व्यक्ति तथा 1000 वर्गफीट पर 10 व्यक्ति सामान्य रूप से रह सकते हैं ।
250 वर्ग फीट से कम क्षेत्रफल पर भूमिहीन परिवारों के 11.42 प्रतिशत परिवार निवास करते हैं। 250 से 500 वर्गफीट क्षेत्रफल में 18.58 प्रतिशत 500 से 700 वर्गफीट क्षेत्रफल में 22.86 प्रतिशत 750 से 1000 वर्ग फीट क्षेत्रफल में 10 प्रतिशत एवं 1000 से अधिक वर्गफीट क्षेत्रफल में 37.14 प्रतिशत भूमिहीन परिवारो के लोग निवास करते हैं। लघु परिवारों के अंतर्गत सबसे अधिक 500 से 750 वर्ग फीट क्षेत्रफल में निवास करने वाले परिवारों का प्रतिशत 16.79 है यह सबसे अधिक है। सबसे कम 250 से 750 वर्गफीट से कम क्षेत्रफल में निवास करने वाले परिवारों का प्रतिशत मात्र 1.40 हैं।
मध्यम कृषक परिवारों के अंतर्गत 1000 वर्गफीट से अधिक क्षेत्रफल में निवास करने वाले परिवारों का प्रतिशत 72.12 प्रतिशत है तथा 250 से 500 वर्गफीट क्षेत्रफल में निवास करने वाले परिवारों का प्रतिशत 6.65 प्रतिशत है। 500 से 750 वर्गफीट क्षेत्रफल में निवास करने वाले परिवारों का प्रतिशत 9.84 प्रतिशत है। 1000 वर्गफीट क्षेत्रफल मे निवास करने वाले वृहत कृषक परिवारों का प्रतिशत सबसे अधिक 97.06 है। मात्र 2.94 प्रतिशत वृहत परिवारो के लोग 750 से 1000 वर्गफीट क्षेत्रफल में निवास करते हैं। संपूर्ण सर्वेिक्षत परिवारों में मकान क्षेत्रफल के आधार पर मकानों में सामान्य रूप से रहने वाले परिवारों की संख्या 263 व सामान्य से अधिक भीड़भाड़ युक्त वातावरण मे रहने वाले परिवारों की संख्या 45 है जिसका प्रतिशत क्रमशः 85.38 व 14.62 है।
आवास में कमरों की संख्याः
कमरों की संख्या ग्रामीण क्षेत्र के लोगों के स्वास्थ्य स्थिति निर्धारण का प्रमुख कारक है। कमरों की संख्या के आधार पर परिवार की आर्थिक व सामाजिक स्थिति को भी जाना जा सकता है। भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद के अनुसार 1 कमरे में दो व्यक्ति, 2 कमरे में तीन व्यक्ति ,3 कमरे में 5 व्यक्ति, 4 कमरे में 7.5 व्यक्ति तथा 5 कमरे में 10 व्यक्ति सामान्य रूप से रह सकते हैं। अध्ययन क्षेत्र में एक कमरे वाले मकानों की संख्या 20 ,दो कमरे वाले मकानों की संख्या 82 तथा तीन कमरे वाले मकानों की संख्या 61, चार कमरे वाले मकानों की संख्या 42, एवं चार से अधिक कमरे वाले मकानों की संख्या 103 है ।
आवास का स्वामित्वः
मनुष्य के तीन मूलभूत आवश्यकताओं में आवास प्रथम है, जो व्यक्ति के सामाजिक व आर्थिक- स्तर की पहचान है। अध्ययन क्षेत्र में स्वयं के आवास पर रहने वाले परिवारों की अधिकता तथा किराए की व सरकारी आवास में रहने वाले परिवारों की कमी है। सर्वेक्षित गाँव में कुल चयनित (308) परिवारों में से 99.36 प्रतिशत परिवारों के पास स्वयं का अपना आवास है तथा 0.32 प्रतिशत परिवार ऐसे हैं, जो किराए के मकान में रहते हैं। 0.32 प्रतिशत परिवार शासकीय आवासों में निवास करते है।
आवास में शौचालय की सुविधाः
एक आवास में शौचालय संबंधी सुविधाओं का होना अत्यंत आवश्यक है। यह एक ऐसी मानवीय आवश्यकता है, जिसका विशेष महत्व है। अध्ययन क्षेत्र के भूमिहीन व लघुकृषक परिवारों में शौचालय की सुविधा का नितांत अभाव है। गाँव के अधिकांश परिवार शौचालय के लिए खुले मैदानो का उपयोग करते हैं। अध्ययन क्षेत्र के चयनित गाँव में शौचालय की सुविधाओं का अभाव है। संपूर्ण चयनित परिवारों में से मात्र 3.94 प्रतिशत परिवारों के आवासों में शौचालय की सुविधा है।
वृहत कृषक परिवारों में केवल 7 परिवारों के आवासों में पक्का शौचालय व 2 लघुकृषक परिवारों मे तथा 3 मध्यम कृषक परिवारों में शौचालय की व्यवस्था है।
सर्वेक्षित परिवारों में पेयजल की सुविधाः
सर्वेक्षित गाँवों में पेयजल के स्रोत के रूप में हैंडपंप व कुआ मुख्य साधन है। कुल चयनित परिवारों में से 68.84 प्रतिशत परिवारों के लोग हैंडपंप का पानी तथा 31.16 प्रतिशत परिवारों के लोग कुएं का पानी पीने के लिए उपयोग में लाते हैं। सर्वेक्षित गाँव में कुएं के पानी का पीने व नहाने के लिए अधिक उपयोग करने वाले गाँवों में रसौटा प्रमुख हैं। जहां एक तिहाई लोगों के घरों में कच्चे कुएं बने हुए हैं।
सर्वेक्षित परिवारों में विद्युत की सुविधाः
बिजली प्रकाश व्यवस्था के लिए एक महत्वपूर्ण साधन है। बिजली की सुविधा व्यक्ति के जीवन स्तर व उनके आर्थिक स्थिति का परिचायक होता है। कुल चयनित परिवारों में से 69.16 प्रतिशत परिवारों में विद्युत की सुविधा व 30.84 प्रतिशत परिवारों के यहाँ बिजली की सुविधा का अभाव पाया गया है। 60 प्रतिशत भूमिहीन परिवारों के यहाँ बिजली की सुविधा का अभाव पाया गया है। 34.96 प्रतिशत लघुकृषक तथा 4.92 प्रतिशत मध्यम परिवारों में विद्युत की सुविधा का अभाव है। वृहत परिवारों में 100 प्रतिशत परिवारों के यहां विद्युत की सुविधा है।
अध्ययन क्षेत्र में ऊर्जा उपभोग एवं आवास की दशाओं से संबंधित समस्याएँ
सर्वेक्षित अध्ययन क्षेत्र में ऊर्जा उपभोग के वितरण प्रतिरूप में काफी विभिन्नता मिलती है। कूल चयनित परिवारों में से 30.84 प्रतिशत परिवारों में विद्युत की सुविधा का अभाव हैं । 31.16 प्रतिशत परिवारों के लोग अभी भी कच्चे कुएं के पानी का उपयोग पीने के लिए करते हैं, जो स्वास्थ्य के लिए उचित नहीं है। मात्र 3.94 प्रतिशत परिवारों के यहाँ शौचालय की सुविधा हैं। अधिकांश परिवारों के घरों के भूसतह(फर्श) मिट्टी से निर्मित है जिन्हें गोबर से लेप किया जाता है एवं परिवारों के आवासों का रहन-सहन का स्तर भी निम्न हैं। 14.62 प्रतिशत सर्वेक्षित परिवारों के लोग भीड़ -भाड़ युक्त वातावरण (घरों) में रहते हैं जहां कई प्रकार की सुविधाओं का अभाव है।
सुझाव एवं निष्कर्षः
अध्ययन क्षेत्र में ऊर्जा उपभोग वितरण प्रतिरूप व आवासीय दशा की संरचना में कृषि जोत के आकार का पर्याप्त प्रभाव पड़ता है। कृषिजोत का आकार बढ़ने के साथ ऊर्जा उपभोग की मात्रा में वृद्धि तथा आवासीय दशा की संरचना में परिवर्तन होते जाता हैं। पर्यावरण का प्रभाव भी आवासी दशाओं की संरचना पर पडता है। सर्वेक्षित ग्रामीण क्षेत्र में लोगों की परंपरागत आदतों के कारण एवं जिन कृषक परिवारों के यहां पेड़-पौधों व पालतू पशुओं जैसे-गाय, बैल, भैंस एवं बकरी की अधिकता है ।
वहां पर ईंधन के रूप में ऊर्जा प्राप्ति के लिए लकड़ी व कंडा का इस्तेमाल अधिक मात्रा में किया जाता है द्य इसके अतिरिक्त अध्ययन क्षेत्र में लकड़ी व कंडे की आसानी से उपलब्धता एवं बढ़ती तीव्र जनसंख्या वृद्धि, व कृषक परिवारों की आर्थिक-स्थिति कमजोर होने के कारण तथा अपनी परंपरागत आदतों में बदलाव न कर पाने के कारण क्षेत्र में ऊर्जा के अन्य स्रोतों जैसे रसोई गैस एवं गोबर गैस तथा ऊर्जा के प्रमुख स्रोत सौर ऊर्जा का उपभोग ईंधन के रूप में अत्यंत कम रूप में हो रहा है। क्षेत्र में इसके उपयोग को बढ़ावा दिया जाना आवश्यक है। क्षेत्र में सबसे अधिक खाना पकाते समय परंपरागत घरेलू चूल्हे से निकलने वाला धुआं महिलाओं और बच्चों के श्वसन तंत्र को काफी हद तक प्रभावित करता है। अतः क्षेत्र में ऊर्जा के परंपरागत स्रोतों (लकड़ी व कंडा) का उपयोग सीमित रूप में किया जाना आवश्यक है तथा ऊर्जा के अन्य व वैकल्पिक स्रोतों का अधिकाधिक उपयोग आवश्यक है जिससे क्षेत्र में पर्यावरण दशाएं स्वच्छ बना रह सके।
संदर्भ ग्रंथ सूचीः
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Received on 15.11.2021 Modified on 08.12.2021 Accepted on 24.12.2021 © A&V Publication all right reserved Int. J. Ad. Social Sciences. 2021; 9(4):191-197.
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